जिंदगी का सार..

एक रोज जिंदगी तुझको, हम छोड़ चले जाएंगे.! तुम याद मुझे मत करना हम लौट के फिर ना आएंगे.! जो संग बिताएं साथ तेरे जीवन का वो ही सार था.! अब राह अंनत की पकड़ी नही कोई मेरे साथ है.! ख़ुद करना तय है रास्ते ख़ुद ही मंज़िल को पाना है.! पाते मंज़िल को हम है या रह जाते इस पार है.? #अजय57 Advertisements Continue reading जिंदगी का सार..

सावन की फुहार…

सावन में साजन हाथ लगाऊं, भरी-भरी मेंहदी हाथों में.! हरी-हरी चूड़ी कांच की पहनूं, भरी-भरी पहनूं बांहो में.! धानी चुनर ओढ़ के सजना, तुझे रिझाऊं सावन मैं.! खनकाऊं मैं कांच की चूड़ी, आऊं ना तेरी बांहों में.! दौड़ के तूने मुझको पकड़ा, झूला लिया मुझे बांहों में.! अंग से अंग लगा के सजना, भीगा दिया मुझे सावन में.! अजय57 Continue reading सावन की फुहार…

दहलीज़…

बेड़ियां समाज की, पैरों में बंध गई है.! संस्कार मिली है जो, वो राह रोक रही है.! मर्यादा की दीवारें, है सामने खड़ी.! कैसे करुं मैं पार, दहलीज़ अपने घर की.? खानदान की हूं इज़्जत, कर पाऊंगी न पार.! पगड़ी उतर जाएगी, मेरे माँ-बाप के सर से.! दहलीज़ के ही अंदर, महफूज़ मेरी इज़्जत.! गर कर गई मैं पार, खाक़ हो जाएगी इज़्जत.! इज्ज़त जुड़ी … Continue reading दहलीज़…

साजन बिन सावन…

तन-बदन में अगन लगी, मिलन की है चाह.! हरजाई परदेश गयो, बिरह में गुजरो रात.! उमड़ घुमड़ आयो बादल, बरस सावन फ़ुहार.! बारिश भी नही बुझा पायो, लगी जो दिल में आग.! साजन बिन सावन सुनी है, काटूं कैसे रात.! अबकी सावन आओ सजना, बरसो भरी-भरी रात.! #अजय57 Continue reading साजन बिन सावन…

बरसात…

तेरे बिन नही लागे जीयरा, ना भेजा सन्देश रे.! मन व्याकुल मैं तड़पी जाऊं, जानू कैसे हाल रे.? विरह की पीड़ा हमें सताए, दोनों का एक हाल रे.! आ जाओ सावन में साजन, झूलें झूला साथ रे.! अगन तन की तब मिटेगी, हम भिंगे जब साथ रे.! अबकी सावन आओ साजन, भींगे भर #बरसात रे.! #अजय57 Continue reading बरसात…

किताब…

जिंदगी ख़ुद ही #किताब है, फ़ुर्सत में कभी पढ़ना.! हर पन्ने को पलट के देखना, कुछ ना कुछ निकलेगा.! किसी में तुमको दर्द मिलेगा, किसी में होगा प्यार.! कहीं जीवन से चाहत होगी, कहीं होगा बैराग.! जीवन-पथ पर चलते-चलते, क्या खोया क्या पाया है.! हाथ फैलाकर ज़रा देखना, मुट्ठी में क्या आया है.! #अजय57 Continue reading किताब…

Father’s Day…

उनसे ही है #वज़ूद मेरा, उनकी ही परछाईं हूं… मेरी भी अब शक्ल पापा, आपसे मिलने लगी है… कद काठी में आपके जैसा, थोड़ा सा मैं लम्बा हूं… बाल को मैं भी रंगता हूं, जैसे आप रंगते थे… सोंच मेरी भी वही हो गई, जैसे आप सोचते थे… पहले लगता आप गलत है, अब लगता है सही थे… आज नही आप साथ में मेरे, फिर … Continue reading Father’s Day…